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Indus Valley Civilization: The World’s Earliest Urban Society; सिंधु घाटी सभ्यता: इतिहास, प्रमुख स्थल, विशेषताएँ और पतन के कारण Explained

सिंधु घाटी सभ्यता 

सिंधु घाटी सभ्यता विश्व की प्राचीनतम और विकसित सभ्यताओं में से एक थी। इसका विकास लगभग 2600 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व के बीच हुआ। इसे हड़प्पा सभ्यता भी कहा जाता है, क्योंकि इसका पहला पुरातात्त्विक स्थल हड़प्पा (वर्तमान पाकिस्तान में) खोजा गया था। इस सभ्यता का विस्तार आज के पाकिस्तान, पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी भारत के विस्तृत क्षेत्रों तक फैला हुआ था। यह सभ्यता सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारे विकसित हुई थी।


खोज और विस्तार

सिंधु घाटी सभ्यता की खोज 1921 ईस्वी में दयाराम साहनी ने हड़प्पा में और 1922 में राखालदास बनर्जी ने मोहनजोदड़ो में की। इसके बाद कई अन्य स्थलों की खोज हुई, जैसे धोलावीरा (गुजरात), लोथल (गुजरात), कालीबंगन (राजस्थान), राखीगढ़ी (हरियाणा) आदि। इन खोजों से पता चला कि यह सभ्यता अत्यंत विस्तृत और संगठित थी।

नगर योजना

सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसकी सुव्यवस्थित नगर योजना थी। शहरों को दो भागों में बाँटा गया था—ऊपरी भाग (गढ़ या दुर्ग क्षेत्र) और निचला नगर। सड़कों का निर्माण सीधी रेखाओं में किया गया था, जो एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं। घर पक्की ईंटों से बने होते थे और लगभग हर घर में स्नानघर तथा कुएँ की व्यवस्था होती थी। जल निकासी की अद्भुत प्रणाली थी, जिसमें ढकी हुई नालियाँ बनाई गई थीं।

आर्थिक जीवन

इस सभ्यता के लोग मुख्यतः कृषि पर निर्भर थे। वे गेहूँ, जौ, चावल, तिल और कपास की खेती करते थे। सिंधु घाटी सभ्यता विश्व की पहली सभ्यता मानी जाती है जहाँ कपास का उत्पादन हुआ। पशुपालन भी प्रचलित था। लोग गाय, बैल, भेड़ और बकरी पालते थे। व्यापार भी अत्यंत विकसित था। मेसोपोटामिया (इराक क्षेत्र) के साथ इनके व्यापारिक संबंध थे। व्यापार के लिए वे मुहरों (सील) का उपयोग करते थे।

कला और संस्कृति

सिंधु घाटी सभ्यता के लोग कला और शिल्प में निपुण थे। कांस्य की बनी नर्तकी की मूर्ति और पुजारी की मूर्ति प्रसिद्ध हैं। मिट्टी के बर्तन, आभूषण और मनके बड़ी सुंदरता से बनाए जाते थे। पत्थर की मुहरों पर पशुओं की आकृतियाँ और लिपि अंकित मिलती हैं। उनकी लिपि अभी तक पूरी तरह पढ़ी नहीं जा सकी है।

धर्म और सामाजिक जीवन

धार्मिक जीवन के प्रमाणों में माता देवी की मूर्तियाँ, पशुपति जैसी आकृतियाँ और पीपल वृक्ष की पूजा के संकेत मिलते हैं। लोग संभवतः प्रकृति की पूजा करते थे। समाज व्यवस्थित और अनुशासित था। महिलाओं को भी समाज में सम्मान प्राप्त था, जिसका प्रमाण आभूषणों और मूर्तियों से मिलता है।

पतन के कारण

लगभग 1900 ईसा पूर्व के बाद यह सभ्यता धीरे-धीरे समाप्त होने लगी। इसके पतन के कारणों में बाढ़, भूकंप, जलवायु परिवर्तन, नदियों के मार्ग बदलना और बाहरी आक्रमण जैसे कारण बताए जाते हैं। हालांकि सही कारण अभी तक स्पष्ट नहीं है।

निष्कर्ष

सिंधु घाटी सभ्यता प्राचीन भारत की गौरवशाली धरोहर है। इसकी नगर योजना, व्यापार व्यवस्था और कला-कौशल अत्यंत उन्नत थे। यह सभ्यता मानव इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखती है और आज भी पुरातात्त्विक अनुसंधान का प्रमुख विषय बनी हुई है। इससे हमें प्राचीन भारतीय संस्कृति और जीवन शैली की महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।


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